• परमेश्‍वर के अद्भुत कार्यों का स्‍मरण सांत्‍वना देता है

  • |स्तोत्र 77:1| मुख्‍यवादक के लिए। यदूतून के अनुसार। आसाफ का। एक भजन। मैं उच्‍च स्‍वर में परमेश्‍वर की दुहाई देता हूँ; मैं परमेश्‍वर की दुहाई देता हूँ कि वह मेरी ओर ध्‍यान दे।

  • |स्तोत्र 77:2| संकट के दिन मैं स्‍वामी को खोजता हूँ, रात भर मेरे हाथ बिना थके उसकी ओर फैले रहे; मेरा प्राण धैर्य धारण करने में असमर्थ है। a 

  • |स्तोत्र 77:3| मैं परमेश्‍वर का स्‍मरण कर विलाप करता हूँ, ध्‍यान करते-करते मेरी आत्‍मा थक जाती है। सेलाह

  • |स्तोत्र 77:4| तू मेरी पलकों को बन्‍द होने से रोकता है; मैं इतना घबरा गया हूँ कि बोल नहीं पाता हूँ।

  • |स्तोत्र 77:5| मैं अतीत के दिनों का, बीते वर्षों का विचार करता हूँ। b 

  • |स्तोत्र 77:6| मैं रात में अपने संगीत का स्‍मरण करता हूँ; मैं अपने हृदय में ध्‍यान करता हूँ; मेरी आत्‍मा परिश्रम से खोज करती है:

  • |स्तोत्र 77:7| “क्‍या स्‍वामी सदा के लिए मुझे त्‍याग देगा? क्‍या वह फिर कभी कृपा नहीं करेगा?

  • |स्तोत्र 77:8| क्‍या उसकी करुणा सदैव के लिए मिट गई? क्‍या उसकी प्रतिज्ञाएं सदा-सर्वदा को समाप्‍त हो गईं?

  • |स्तोत्र 77:9| क्‍या परमेश्‍वर अनुग्रह करना भूल गया? क्‍या उसने अपने क्रोध में दया-द्वार बन्‍द कर लिया है?”  c  सेलाह

  • |स्तोत्र 77:10| मैंने यह कहा, “यही तो मेरा दु:ख है, कि सर्वोच्‍च प्रभु का दाहिना हाथ, उसका सामथ्‍र्य बदल गया है।”


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