• आंधी में प्रभु की आवाज

  • |स्तोत्र 29:1| दाऊद का भजन। ओ परमेश्‍वर के दूतो [1] प्रभु के गुणों को स्‍वीकार करो; तुम प्रभु की महिमा और शक्‍ति को स्‍वीकार करो। a 

  • |स्तोत्र 29:2| तुम प्रभु के नाम की महिमा को स्‍वीकार करो; पवित्रता से सजकर [2] प्रभु की आराधना करो।

  • |स्तोत्र 29:3| प्रभु की वाणी सागरों पर है; महिमायुक्‍त परमेश्‍वर गरजन करता है; प्रभु महासागरों पर है। b 

  • |स्तोत्र 29:4| प्रभु की वाणी शक्‍तिशाली है; प्रभु की वाणी तेजस्‍वी है।

  • |स्तोत्र 29:5| प्रभु की वाणी देवदार के वृक्षों को उखाड़ फेंकती है; प्रभु लबानोन के देवदारों को नष्‍ट करता है।

  • |स्तोत्र 29:6| वह लबानोन को बछड़े के समान और हेर्मोन [3] पर्वत को सांड़ जैसा कुदाता है।

  • |स्तोत्र 29:7| प्रभु की वाणी अग्‍नि-ज्‍वाला उगलती है।

  • |स्तोत्र 29:8| प्रभु की वाणी निर्जन प्रदेश को प्रकंपित करती है; प्रभु कादेश निर्जन प्रदेश को कंपित करता है।

  • |स्तोत्र 29:9| प्रभु की वाणी बांज वृक्षों को झकझोरती है; [4] और वन के वृक्षों को झाड़ देती है; तब उसके भवन में सब पुकार उठते हैं, “प्रभु की महिमा हो!”

  • |स्तोत्र 29:10| प्रभु जल-प्रवाह पर विराजमान है; राजाधिराज प्रभु युग-युगांत सिंहासनारूढ़ है।


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