• प्रभु के अभिषिक्‍त राजा की घोषणा

  • |स्तोत्र 2:1| क्‍यों राष्‍ट्र षड्‍यन्‍त्र करते हैं? क्‍यों विभिन्न देश व्‍यर्थ जाल फैलाते हैं? a 

  • |स्तोत्र 2:2| प्रभु और उसके अभिषिक्‍त राजा के विरोध में, संसार के राजाओं ने संकल्‍प किया है, शासकों ने एक साथ मन्‍त्रणा की है।

  • |स्तोत्र 2:3| वे कहते हैं, “आओ, हम उनकी बेड़ियां तोड़ डालें, अपने ऊपर से उनके बन्‍धन की रस्‍सियां उतार फेंकें।”

  • |स्तोत्र 2:4| स्‍वामी, जो स्‍वर्ग में विराजमान है, हंसता है; वह उनका उपहास करता है। b 

  • |स्तोत्र 2:5| तब वह अपने क्रोध से उनको आतंकित करेगा, वह रोष में उनसे यह कहेगा,

  • |स्तोत्र 2:6| “मैंने अपने पवित्र पर्वत सियोन के सिंहासन पर अपने राजा को प्रतिष्‍ठित किया है।”

  • |स्तोत्र 2:7| मैं प्रभु के निश्‍चय की घोषणा करूंगा : उसने मुझसे यह कहा है : “तू मेरा पुत्र है, आज मैंने तुझे उत्‍पन्न किया है। c 

  • |स्तोत्र 2:8| मुझसे मांग, और मैं राष्‍ट्रों को तेरी पैतृक- सम्‍पत्ति और सम्‍पूर्ण पृथ्‍वी को तेरे अधिकार में कर दूंगा। d 

  • |स्तोत्र 2:9| तू उन्‍हें लौह-दंड से खण्‍ड-खण्‍ड करेगा, कुम्‍हार के पात्र-सदृश उन्‍हें चूर-चूर करेगा।”  e 

  • |स्तोत्र 2:10| अत: राजाओ, अब बुद्धिमान हो पृथ्‍वी के शासको, सावधान हो!


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