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स्वयं प्रभु ने सियोन को दु:ख दिया है
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|यिर्मयाह के विलाप 2:1|प्रभु ने सियोन की पुत्री को अपने प्रकोप के मेघों से ढक दिया! उसने इस्राएल के वैभव को आकाश से पृथ्वी पर फेंक दिया! उसने अपने प्रकोप-दिवस पर अपने चरणों की चौकी को स्मरण न रखा। a
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|यिर्मयाह के विलाप 2:2|स्वामी ने निर्दयतापूर्वक याकूब राष्ट्र की सब बस्तियों को नष्ट कर दिया; उसने अपने क्रोध से यहूदा की पुत्री के गढ़ों को ध्वस्त कर दिया। उसने राज्य और उसके शासकों को अपमानित कर धूल-धूसरित कर दिया।
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|यिर्मयाह के विलाप 2:3|प्रभु ने अपनी क्रोधाग्नि में इस्राएल राष्ट्र की शक्ति के प्रतीक सींग को काट दिया, उसने शत्रु के आक्रमण के समय अपना दाहिना हाथ इस्राएली सेना से खींच लिया। उसने याकूब राष्ट्र में अग्नि प्रज्वलित की, जिसने चारों ओर सब को भस्म कर दिया।
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|यिर्मयाह के विलाप 2:4|उसने शत्रु के सदृश धनुष चढ़ाया; उसने बैरी के समान हाथ बढ़ाया; और सियोन की पुत्री के तम्बू में हमारी आंखों में प्रिय लोगों को मार डाला। उसने अग्नि के सदृश अपने क्रोध की मदिरा उण्डेल दी।
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|यिर्मयाह के विलाप 2:5|स्वामी हमारा शत्रु बन गया; उसने इस्राएल राष्ट्र को नष्ट कर दिया। उसने इस्राएल के सब महलों को ध्वस्त कर दिया, उसके गढ़ों को खण्डहर बना दिया। उसने यहूदा की पुत्री के घर-घर में विलाप और रोना-पीटना मचवा दिया।
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|यिर्मयाह के विलाप 2:6|उसने अपना मन्दिर उद्यान के मचान की तरह अचानक गिरा दिया; अपने निर्धारित पर्वों के पवित्र स्थान को खण्डहर बना दिया। प्रभु ने सियोन में निर्धारित पर्व और विश्राम- दिवस समाप्त कर दिए; उसने अत्यन्त क्रुद्ध हो राजा और पुरोहित दोनों को त्याग दिया।
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|यिर्मयाह के विलाप 2:7|स्वामी ने अपनी वेदी त्याग दी; उसने अपना पवित्र स्थान छोड़ दिया। उसने सियोन के भवनों की दीवारें शत्रु के हाथ में सौंप दीं। जैसे निर्धारित पर्व के दिवस पर प्रभु के मन्दिर में कोलाहल होता है वैसे ही शत्रुओं ने कोलाहल मचाया। b
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|यिर्मयाह के विलाप 2:8|प्रभु ने यह निश्चय किया था कि वह सियोन की पुत्री की शहरपनाह ढाह देगा; उसने साहुल से नापकर निशान लगाए; उसने विनाश करने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, और उसको नहीं रोका। उसने परकोटा और शहरपनाह को रुला दिया, दोनों एक-साथ जर्जर हो गए। c
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|यिर्मयाह के विलाप 2:9|उसके प्रवेश-द्वार भूमि में धंस गए; प्रभु ने उसकी अर्गलाएँ टुकड़े-टुकड़े कर दीं। उसका राजा और प्रशासक विदेशी राष्ट्रों में निर्वासित हैं। व्यवस्था की मान्यता नहीं रहीं; नबियों को प्रभु की ओर से दर्शन नहीं मिलता। d
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|यिर्मयाह के विलाप 2:10|सियोन की पुत्री के धर्मवृद्ध निराशा में डूबे भूमि पर बैठे हैं। उन्होंने पश्चात्ताप प्रकट करने के लिए अपने-अपने सिर पर राख डाली है, और टाट का वस्त्र पहिना है। यरूशलेम की कन्याएँ भूमि की ओर सिर झुकाकर विलाप कर रही हैं।
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